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मिलाते हो उसी को ख़ाक में
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परिकल्पना : सजीव सारथी आलेख : सुजॉय चटर्जी स्वर : रचिता देशपांडे प्रस्तुति : संज्ञा टंडन नमस्कार दोस्तों, ’एक गीत सौ अफ़साने’ की एक और कड़ी के साथ हम फिर हाज़िर हैं। फ़िल्म और ग़ैर-फ़िल्म-संगीत की रचना प्रक्रिया और उनके विभिन्न पहलुओं से सम्बन्धित रोचक प्रसंगों, दिलचस्प क़िस्सों और यादगार घटनाओं को समेटता है ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ का यह साप्ताहिक स्तम्भ। विश्वसनीय सूत्रों से प्राप्त जानकारियों और हमारे शोधकर्ताओं के निरन्तर खोज-बीन से इकट्ठा किए तथ्यों से परिपूर्ण है ’एक गीत सौ अफ़साने’ की यह श्रॄंखला। दोस्तों, आज के इस अंक के लिए हमें चुनी हैं वर्ष 1928 में रेकॉर्ड और जारी की हुई ग़ैर-फ़िल्मी ग़ज़ल - "मिलाते हो उसी को ख़ाक में जो दिल से मिलता है"। पियारा साहेब की आवाज़। कलाम है दाग़ देहलवी का। मौसिक़ी पियारा साहेब की ही। इस ग़ज़ल के बहाने जानें भूले बिसरे गायक पियारा साहेब की ज़िन्दगी और उनकी गुलुकारी के बारे में। साथ ही दाग़ देहलवी की शाइरी की ख़ासियत पर एक नज़र। इस ग़ज़ल के तमाम शेरों को इस अंक में सुनते हुए महसूस कीजिए दाग़ की लेखनी की आधुनिक शैली को। जिस रेकॉर्डिंग सत्र में यह ग़ज़ल रेकॉर्ड हुई थी, उसी सत्र में पियारा साहेब ने एक अन्य ग़ज़ल भी रेकॉर्ड की थी जिसके आधार पर 1988 की फ़िल्म ’शूरवीर’ के लिए गीतकार एस. एच. बिहारी ने एक गीत लिखा था। कौन सी थी वह ग़ज़ल? ये सब आज के इस अंक में।
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Ek Geet Sau Afsane25 tracks · Track 24Every song has its own journey once it is released for the audiences but there are many back stories...
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